Wednesday, 4 February 2009

आज बहुत दिनों के बाद लोगिन किया है। जब से ट्रेन से गिरा था हिम्मत ही नहीं हो रही थी। और काम भी ज्यादा था इसलिए मौका ही नहीं मिला लिखने का। अब थोड़ा ठीक है, दर्द कम है लेकिन अभी भी है। धीरे-धीरे चला जाएगा। चलने में थोडी दिक्कत होती है लेकिन पहले से कम है। एक बार तो लगा था की अब उठ नहीं पाउँगा। मिट्ठू को फ़ोन किया था उसने बोला की वो ठीक है। जानकर बहूत खुशी हुई। चलो तीन लोगों में से कम से कम दो लोग तो खुश हैं। एक का क्या है, अगर एक के दुःख से दो लोग खुश हो सकते हैं तो ये कीमत बहुत कम है मेरे मिट्ठू के लिए। मुझे लगता था की प्रतीक के साथ मिट्ठू खुश रहेगी क्योंकि प्रतीक तो मिट्ठू की ही पसंद है न। और मेरे मिट्ठू की पसंद कभी ग़लत नहीं हो सकती। एक मैं ही ग़लत हो गया, पता नहीं कैसे?
सुशांत से बात हुई थी, उसने कहा के वहां मेरे लिए नौकरी हो जायेगी। मुझे दिल्ली बुलाया है। मेरा जाने का तो मन नहीं है, लेकिन नौकरी तो चाहिए न। मैं ज्यादा दिनों तक गाड़ी नहीं चला सकता, क्योंकि डर लगता है कहीं यहाँ भी दिल्ली जैसा हो जाए तो क्या होगा? लगता है डॉक्टर साब आ गए हैं। अब चलता हूँ। हे भगवन मेरी मिट्ठू को सारी खुशीयाँ देना। वो प्रतीक के साथ खूब खुश रहे। यही मेरी प्रार्थना है तुमसे।

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